This poem is dedicated to the time, when i left my home town for the first time and traveled to a city, thousands of kilometers away, for work.
मैं नन्हीं चिड़िया
मैं नन्हीं चिड़िया थी,
कुछ साल पहले ,
छोटे-छोटे पाँव थे,
और छोटे-छोटे डैने।
दम भरके उड़ती,
जब खुले आकाश में ,
तो सोचती, चल उड़ें आज इधर,
चल उड़ें आज वहां।
बादलों के भीतर ,
जहाँ सिमटता हो जहाँ।
कब होउंगी बड़ी,
के नाप सकू यह आकाश।
जाऊं वहां जहाँ तक,
जाता हो प्रकाश।
दूर इस घोंसले से,
इंद्रधनुष के उस पार ,
कैसा होगा वह समां।
कब जाऊं और कब जाऊं ,
ऐसा सोचती और सोचती।
आया वह समय भी,
जब हुई मैं बड़ी,
कह कर सबको अलविदा,
घोंसले से चल पड़ी।
प्रेम, सत्कार और सम्मान की,
आशा लिए मन मैं,
उड़ रही थी नए जहाँ की ओर।
रंगीन सपने बुनते-बुनते,
जाने कब आ गया छोर।
आशाओं से विपरीत,
पाया नया जहाँ।
प्रेम और सत्कार, यहाँ था कहाँ।
मन की धुंध हो गयी साफ़।
मेरे प्यारे घोंसले, मुझे कर देना माफ़।
ठोकरों के सिवा यहाँ कुछ नहीं।
सोचती हूँ, जिसे छोड़ा, वहां लौटूं या नहीं।
- मीनाक्षी शर्मा
©MeenakshiSharma 2018 'All Rights Reserved'

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